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अनसुलझे, अछूत समांतर सोच। कबीर सामान्य विषय।

  अनसुलझे, अछूत समांतर सोच इंसान या कहे आप और हम जब तक जीते है। तब तक हम सिर्फ अपनी सोच की वजह से जीते है। और हमारी सोच ही हमारी जीवन है। जो भी समाज में चीज है। वो सिर्फ एक सोच है परिवार के साथ रहना या परिवार को छोड़ देना, बुरी आदते रखना या उससे छोड़ देना ये सब एक सोच से जुड़ा है। जब हम अपनी सोच को छोड़ देता है। तो हम उसे के साथ अपने जीवन को छोड़ देते है। इस दुनिया में आप कुछ भी चीज ना ही ही पैदा कर सकते हो और ना ही तबाह कर सकते हो आप, या यू कहे हम बस उस चीज को इखट्टा करके उससे कुछ अलग बना सकते है। और हम उससे तबाह नही कर सकते उससे छोड़ सकते है। पर कुछ यह कहेंगे की अगर किसी ने कागज बनाया और किसी दूसरे ने उससे जला दिया तो जिसने जलाया उसने तो उससे तबाह(खतम) कर ही दिया। हां, यह सही है।उसने उससे तबाह कर दिया। दरअसल यहा सिर्फ उसे जलने से ढांचा बदला या (बिगाड़ा) है। कहने का मतलब की यह बस उसने उससे जला के उसके हुलिया बदला है। तबाह नही किया । प्रकृति के नियमों को हम कितना जानते हैं। या जान रहे है। उससे ये चीज तो स्पष्ट हो जाती है। की प्रकृति में आप कुछ चीज पैदा और तबाह नही कर सकते बस उसका ह...

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